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22 Comments to “Follow us”

  1. Rajesh Patel says:

    मै संस्कृत भाषा को बहुत प्रेम करता हु, संस्कृत का पुरे विश्व में प्रसार और पचार हो ऐसी मेरे ह्रदय की महेछा है. संस्कृत भारत की रास्त्रभाषा होनी चाहिए थी. जय संस्कृतम.!

    • Biju Verghese says:

      Sanskrit is such a marvellous language within itself. Its divinity gets me goosebumps,the scientificality and charm in conveying the message.Truly amazing.

  2. Bala Krishanan.R. says:

    Though a beginner in Sanskrit learning, i was able to read and understand a few lines in your news paper.

    you can publish this news item in your paper.if you think proper.

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    Bala Krishnan

  3. kuldeep pandey says:

    प्यारे सर
    मै ये न्यूज़ पेपर डेली अपने होम टाउन (कानपुर )
    में चाहता हूँ कृपया करके इसका उपाय बताये
    घन्यबाद
    कुलदीप पाण्डेय
    कानपुर
    9452275326

  4. Anupam says:

    संस्कृत का अर्थ है, संस्कार की हुई भाषा। इसकी गणना संसार की प्राचीनतम ज्ञात भाषाओं में होती है। संस्कृत को देववाणी भी कहते हैं।

    § ऋग्वेद संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। ऋग्वेद के मन्त्रों का विषय सामान्यत: यज्ञों में की जाने वाली देवताओं की स्तुति है और ये मन्त्र गीतात्मक काव्य हैं।
    § यजुर्वेद की शुक्ल और कृष्ण दो शाखाएं हैं। इसमें कर्मकांड के कुछ प्रमुख पद्यों का और कुछ गद्य का संग्रह है। ईशोपनिषद इसी का अंतिम भाग है।
    § सामवेद में, जिसका संकलन यज्ञों में वीणा आदि के साथ गाने के लिए किया गया है, 75 मौलिक मन्त्रों को छोड़कर शेष ऋग्वेद के मन्त्रों का ही संकलन है।
    § अथर्ववेद की भी शौनक और पैप्पलाद नामक दो शाखाएं हैं।

  5. Anupam says:

    संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।

  6. Anupam says:

    संस्कृत और एकता भाषा वह माध्यम है जो विचारों और भावनाओं को शब्दों में साकारित करती है, और संस्कृति वह बल है जो हम सब को एकसूत्रता में परोती है । पर भारतीय संस्कृति की नींव “संस्कृत” में है ।
    “एकता” कृति में चरितार्थ होती है, और कृति की नींव विचारों में है । पर विचारों का आकलन भाषा के बगैर संभव नहीं । तब भाषा ऐसी समृद्ध होनी चाहिए जो गूढ, अमूर्त विचारों और संकल्पनाओं को सम्यक् रुप से आकार दे सकें । जितने स्पष्ट विचार, उतनी सम्यक् कृति; और विचार-आचार की समाज में एकरुपता याने “एकता” ।
    आइये सुसंस्कृत बनें ! और उस अंतर को मिटा दें जो प्रांत, वर्ग, वर्ण, भाषा, संप्रदाय और वित्त इत्यादि ने व्यक्ति-व्यक्ति के बीच खडा किया है ।

  7. Anupam says:

    यदि आज समय रहते हम नहीं जागे तो कल को हमारी आने वाली पीढियाँ हमसे यही पूछेंगी कि आखिर यह संस्कृत क्या है और इसे किसने बनाया था? #Sanskrit

  8. Vishal Singh says:

    संस्कृत में वेब पोर्टल ढेक कर बहुत ख़ुशी हुई.हर किसी का अपना समय होता है.ऐसा मेरा विश्वास है की संस्कृत फिर से अपने पुराने वाभैव्शाली अतीत को प्राप्त करेगी.
    हमें भी पुरे तन मन धन से इस ओर प्रयास करना चाहिए.

  9. राज गौर says:

    ‘सुधर्मा’ एक मात्र संस्कृत दैनिक के प्रकाशन में संलग्न सभी महान व्यक्तियों को सादर नमन,
    यह एक दैनिक का प्रकाशन मात्र नही है अपितु एक आंदोलन है,
    राजेश पटेल जी, बीजू वर्घीस जी, बालकृष्णन जी, आदि आदि अनेक अनेक महान लोग इस आंदोलन से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ना चाहते हैं, यह भी एक स्वागत योग्य कदम है,
    हम सब मिलकर इस आंदोलन, इस पवित्र काम में सहभागी बने, सहयोगी बने;
    ट्विटर व फेसबुक में इसके प्रचार, प्रसार में भागीदार बने,
    शुभेच्छु,
    राज गौर

  10. Saroj Sahu says:

    Sanskrit is not only an ancient language but also a scientific language. It should be our medium of instruction.

  11. किशोर कृष्ण शेवडे says:

    मान्याः,
    प्रथमे संस्कृतदिन प्रसङ्गे शुभकामनाः| संस्कृते वृत्तपत्रं पठित्वा भृशं प्रमुदितोऽहं| तथापि पत्रमिदं नियमिततया प्रतिदिनं प्रकाशितं भवेदिति मनसा कामये| गतमासत्रयात् दृश्यते यत् यदा कदा अस्य प्रकाशने विलम्बः भवति| विलम्बः अयं भृशं दुनोति|
    शुभाः सन्तु पन्थानः – किशोर कृष्ण शेवडे

  12. Sridhara sharma says:

    सुधर्मायाः संस्कृत सन्घ़ेशाः संस्कृत छात्राणां संस्कृतभाषां अधिकर्तुं प्रयोजनमस्ति ।

    एषा सुधर्मा अविच्छिन्ना भवेत् ।

  13. sreedhar konda says:

    Namaskar
    I just got a message about sanskrit language importance with your enews paper site i thought of visiting your site felt happy for preserving the language using it in your daily life. i am feeling happy that i have born in the country where not only has rich culture it is the origin for whole universe where sanskrit language only has the power to reveal the secrets of the universe. there is no doubt about it in the coming generations the whole world common language will be sanskrit
    Jai hind Jai bharat

  14. Sushil Mahaldar says:

    Can you send me your e-mail address?
    I had some thoughts about increasing the
    circulation of Sudharma.

  15. Manish Bharti says:

    I will spread this Newspaper to all my friends.

    I will also donate money to this organisation.

    Thank you so much for giving me Sanskrit Newspaper.

  16. Shiv sahil says:

    Hi,
    I am not able to donate whether I am using my icici master card or virtual card . it is displaying that this debit card is not valid use some other card
    Regards,
    -Shiv Sahil Guleri

  17. Dr. K. M. Prasad says:

    I would like subscribe for the online version of the Sudharma Sanskrit news paper daily.
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    I live in NJ, USA and my contact # is +17327319716

    Dr. Prasad K.M.

  18. Rajkumar Librarian Sri sri college of ayurvedic sc and research bangalore says:

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  19. Dnyanada says:

    नमस्कार.
    मला संस्कृत वाचता येते परंतु अस्खलित बोलता येत नाही म्हणून हा संदेश माझ्या मातृभाषेत लिहित आहे.
    लोकसत्ताच्या ९ डिसेंबर च्या पुरवणीमध्ये सुधर्मा बद्दल वाचले.
    संस्कृत वृत्तपत्र वाचता येणार म्हणून आनंद वाटला.
    ई- सब्स्क्रिप्शन साठी शुल्क नाही. अथवा ते देण्याची तयारी होती.
    संस्कृत-जतन करण्यात सक्रिय असल्याबद्दल सुधर्माला धन्यवाद.

  20. Preeti says:

    Bht dukh hota hai jab hum sanskrit padhne wale student apni bhasha ki usi ke desh me ye halat delhte h.. kash har koi iske prati jagruk ho.. mujhe aaj pehli bar is bharat desh me janm lene par bht bura mehsus ho rha h ki apni bhasha ko log kese bhool sakte h.. modern hona koi buri baat nahi but apni sanskriti apni mool bhasha ko chhor aur sb bhasha k pichhe is kadar bhagna ki log apni mool bhasha ko hi khatam krne me lage hai, mai kbhi bhi facebook aadi par koi comments nahi karti aaj pehli baar kahi likhne ka man hua bht dukh hua ki kyu koi is sanskrit bhasha par dhyan nahi deta french germn adi ko padhna bura nahi lekin apni bhasha ko is kadar haal kar dena bht galat hai agar esa hi raha to ek din sach me hm bhartiye apni bhasha ko kho jane par aur logo ko dekhkr bht pachhtayege … aaj jb itihas ki baat ane par garv krte h ki rigved sabse purana h adi adi.. samay ane par koi ye garv bhi nahi kar payega.. are apni sanskriti ko dhang s kbhi sakaratmata k sath jana nahi aur log modern hone ki aur bhagte h, modern hou lekin km s km apni sanskriti ko to mt bhulo… jis din mai apne pairo pr khadi ho jaugi kuchh kamaugi mai is news paper k lie zarur kuchh karugi aaj mai sirf ek student hu is karan me paiso se madad nahi kr skti.. lekin aaj maine apne ap se ek vada kiya h mai har kisi ko is samachar patra k lie jagruk karugi ye maira sirf sanskrit padhne k lie prem hi nahi apni sanskriti apne desh aur apni mool bhasha aur bharat desh ke mool swaroop ke prati pyar ke karan h… mujhe jo bhi student milega mai use iske prati jagruk krugi… maine ye comment kisi bht hi dil s likha hai kisi bhadhaio ke lie nahi mjhe aaj sach me bht dukh ho raha hai ki apni bhasha ka ek lauta newspaper aur logo ka dil itna pathar ki apni sanskriti ke prati koi jagruk nahi jo sipahi border pr is desh ki surksha kr rha h wo ese logo ki suraksha kar rha h jo sanskritik roop me apne bharat desh k sath bht galat kar rahe h… unka balidaan tbhi hmare lie sarthak hga jis din is desh ka har nagrik asal roop me apni sanskriti ko bchaega… maira vaada h mai apne s milne wale har vyakti ko iske prati jagruk karugi…

  21. निलेश दुबे says:

    आद्रणीय महोदय
    मै निलेश दुबे नवीमुंबई से हुं मै अपनी संस्कुत भाषा से बेहद
    प्यार करतें हैं और इसके संरक्षण के लीये हर संभव मद्द
    करने को तैयार हैं ।
    तथा यह वुत्तपत्र हमें नवी मुंबई मे भी चाहीए इसलीये आप
    हमें यहां उपलबद्ध करा सकतें हैं तो मै आभारी रहुंगा व
    हम यहां ईसके प्रचार प्रसार भी कर सकतें हैं
    मेरा नं ९५९४५४०१०० है।

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